सध्या महाराष्ट्रात जो भाषावाद व प्रांतवाद उसळला आहे त्यावरून सचिनला प्रश्न विचारणे हेच मुळात चुकीचे आहे, असे मला वाटते. चुकीच्या व्यक्तीला, चुकीचा प्रश्न विचारला की उत्तरही चुकीचेच मिळणार!
9 Comments Tell a friendBury
written by rkrajkamal 815 days ago
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भारत बनाम ठाकरे
देशभक्ति या कुर्सी व नाम की भूख
अगर में अपनी बात करूं, तो मैंने अपने जीवन के ८ वर्ष महाराष्ट्र में बिताये हैं ! वहां मैंने मराठी भाषा और संस्कृति को वहां के लोगों के मध्य रह कर जिया और देखा है ! वास्तव में ये एक अनमोल धरोहर है ,और हमारा देश ही मात्र ऐसा देश है जो इस प्रकार की धरोहरों को अपने अंदर संजो कर रखे हुए है! पता नहीं कितने जुल्म हमारे इस देश और और इसकी संस्कृतियों पर हुए, मगर हम पुरातन हैं, हम सनातन हैं, हम कल भी थे ,हम आज भी हैं, और हम ही हैं जो सदैव रहेंगे! विभिन्नता में एकता हमें औरों से अलग करती है!जहाँ अतिथि आज भी देव तुल्य है, जहाँ धरती और नदियों को माता कहा जाता है, जहां आज भी अजनबियों को भैया या बहिन का संबोधन दिया जाता है , ऐसा प्यारा, अनमोल, विचित्र, अनोखा और महँ देश है हमारा! पता नहीं कितने मीरकासिम, जयचंद,और जिन्ना जैसे गद्दारों ने इसे ख़तम करना चाहा मगर जो अजर-अमर है उसे कौन मिटा सकता है!
आज हमारी एकता को ठाकरे नाम का गद्दार फिर ललकार रहा है, वो भी पुराने गद्दारों की तरह सत्ता के लोभ में हमें आपस में लड़ा रहा है, और वो लोग जिनकी अपनी खुद की कोई सोच नहीं है वो उसका साथ दे रहे हैं! लगभग ७५० साल की गुलामी हमने अपनी आपसी फूट के कारण झेली थी! जो हम से अलग हुए(पकिस्तान, बँगला देश, म्यांमार) वो आज तक पनप नहीं पाए हैं !हम आज भी उनसे ज्यादा उन्नत और विकसित हैं!
ठाकरे जैसे लोग पहले तो लोगों के दिलों में ज़हर घोल रहे थे अब उम्र के इस पड़ाव पर सचिन जैसे महान खिलाड़ी के बारे में अभद्र शब्द कह कर अपनी नीच सोच का साक्ष्य दिया है! अगर अपनी संस्कृति और भाषाका इतना ही ख़याल है तो अपने ५ सितारा बंगले और गाड़ियों को छोड़ कर उन गरीब किसानो और लोगों के बीच जा कर सिर्फ १ महिना रह कर दिखाओ, जिन्दगी, गरीबी, संसाधनों की कमी का सही पता तो तब चलेगा! मात्र बकवास करने से कुछ नहीं होगा! मराठी और मराठा की महानता इतनी कच्ची नहीं किउसे कोई भी ख़तम कर देगा!
सचिन के साथ तो पूरा देश ही नहीं वरन पूरा विश्व है मगर कुम्हारे पीछे कौन है इसका पता भी तुम को चुनाव के नतीजों से मिल गया है! अब तुम उस ढोल कि तरह बज रहे हो जो अन्दर से खोखला होता है!
जय हो भारत कि सब्स्कृति, जय हो भारत कि हर भाषा, जय हो भारत का हर निवासी!
आपल्या मताशी सहमत नाही. सचिनला खडसावले म्हणजे ठाकरे (जर आपण बाळासाहेब ठाक-यांबद्दलच बोलत असाल तर,) देशद्रोही होत नाहीत. मुंबईचं मुळ नाव विसरून ’बॉम्बे’, ’बंबई’ असे निरनिराळे अपभ्रंश वापरले जात असताना मुंबई नगरीला ’मुंबई’ हे मूळ नाव पुन्हा मिळवून देण्यात ठाकरे यांचंच योगदान आहे. आज मुंबईतील दुकानांवर मराठीत पाट्या दिसताहेत, त्यांचं श्रेयही ठाकरे यांनाच जातं. आपसातल्या शत्रूत्वामुळे १९४७ मधे तिस-याचा फायदा कुणामुळे झाला, हे सर्वजाहिर आहे. ती परंपरा अजूनही सुरुच आहे. ’मुंबई सगळ्यांचीच’ या उत्तरामुळे मुंबईचं बिहार करणा-यांना त्याचा फायदा उचलता येऊ नये, म्हणून ठाक-यांना ते बोलणं आवश्यक होतं असं मला वाटतं. या सर्व प्रकारात ज्या पत्रकाराने असा मुर्ख प्रश्न विचारण्याचा अगोचरपणा केला आहे, त्या पत्रकाराबद्दल कुणालाच काही वाटत नाही. आग रामेश्वरी आणि बंब सोमेश्वरी अशी परिस्थिती तयार झाली आहे. प्रसारमाध्यमांनी प्रश्न विचारताना प्रसंग, परिस्थितीचे भान ठेवायला हवे, याचंही भान कुणाला नाही.
मराठी आणि मराठा इतका कच्चा नाही हे सध्या चाललेल्या आंदोलनांवरून आपल्याला दिसत असेलच. महाराष्ट्रात आपण आठ वर्षे काढलीत, हे खरेच असले पाहिजे, त्याशिवाय का आपण मराठी लेखावर हिंदी भाषेत प्रतिक्रिया देऊ शकलात? मराठीकट्टावर माझ्या लेखाचं संक्षिप्त स्वरूप मांडलं आहे, मात्र माझ्या ब्लॉगवरचा हा पूर्ण लेख आपण वाचला आहे का? मी कुठेही ठाकरे (बाळासाहेब ठाकरे), राज ठाकरे, तसेच सचिन तेंडूलकर यांना चूक म्हटलेले नाही.
ठाकरेंना जर देशद्रोही ठरवायचे असेल, तर लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आझमी यांना काय म्हणणार तुम्ही? त्यांची वक्त्यव्य देशातील जनतेत फूट पाडत नाहीत? दोन मिनिटं असा विचार करा की जर सचिन तेंडूलकरने ’मुंबई मराठी माणसाचीच’ असं उत्तर दिलं असतं, तर देशभरातून कशी प्रतिक्रिया उमटली असती? ढोल आतून पोकळ असतो म्हणूनच त्यातून आवाज येतो. निवडणूकीतील शिवसेनेचा पराभव आणि कॉंग्रेसचा विजय म्हणजे सत्याचा विजय असं तुम्ही म्हणत असाल, तर त्याच शिवसेनेतून बाहेर पडलेला बाळासाहेबांचा अस्सल चेला हळूहळू कशी वाटचाल करतो आहे, हेही तुम्ही पाहिलं असेलच. प्रत्येक व्यक्तीच्या कतृत्वाला वयाची आणि शरीराची बंधनं पाळावीच लागतात. शिवसेनेचा हाच वाघ जर आज थोडा तरूण असता, तर असल्या तरसांना त्याने केव्हाच खाऊन टाकलं असतं.
written by rkrajkamal 815 days ago
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प्रिय मित्र कंचन,
आपने जो लिखा उस से तो यही प्रतीत होता है के आप की अपनी कोई विचारधारा नहीं है! अगर मेरा नाम राज कमल कि जगह कुछ और भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता में सिर्फ कर्म में विशवास रखता हूँ! बोलने कि आदत तो सिर्फ नेताओं कि होती है!अच्छी बात है के मुंबई का नाम बॉम्बे से बदल दिया गया है और ये ही हमारी विरासत कि पहचान है मगर कुछ तो सोचो के सिर्फ नाम से नहीं, किसी कि भी पहचान कर्म से होती है! अगर आप इतिहास को शुरू से आज तक पढ़ें तो आप को ज्ञात होगा के हम भारतियों ने आपसी फूट से क्या-क्या खोया है! सोने कि चिड़िया कहा जाने वाला देश पता नहीं कितनी बार लूटा और बर्बाद किया गया है! १ कोटि कीमत कि कार में घूमने वाले नेता कि बात आप को अच्छी लगती हैं! उस नेता के पक्ष में आप इस का जवाब यहाँ लिख भी रहे हो मगर क्या आपने कभी विदर्भ के किसानो के दर्द के बारे में लिखा है! जहां तक बात राजनीति कि है तो में आप को ये साफ़ बता देता हूँ के में किसी नेता पर भी विशवास नहीं करता, उन लोगों कि ओकात सिर्फ जुबान चलाने कि होती है और मासूम लोग उसमे फंस कर उन को वोट दे देते हैं! रही बात लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आज़मी और मायावती की तो मेरे भाई ये सब परदे के पीछे ठाकरे जैसे ही हैं! जैसे आप आज ठाकरे को अच्छा कह रहे हो उसी प्रकार कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन लोगों को भी अच्छा कहते हैं! वोट बैंक किस प्रकार बनता है ये अभी आप को पता भी नहीं है! एक बार की जीत ५ वर्ष के लिए राजा बना देती है! इस के लिए चाहे आप को कुछ भी कहना पड़े और कुछ भी करना पड़े! आप अभी मधु कोड़ा, नरेन्द्र मोदी , सुखराम और ना जाने कितने हैं जिनका नाम नहीं लिख रहे हैं आप वोही लिख रहे हैं जो आप ने सुना है, क्या आपने कभी किसी किसान के खेत में हल चलाया है, क्या आपने कभी किसी के दुःख में आंसू बहे हैं! आप तो अभी महाराष्ट्र का पूरा इतिहास भी नहीं जानते होंगे फिर देश आप के लिए तो कोई मायने ही नहीं रखता! महान क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज की आधी बात तो सब को याद है मगर, यदि आपने क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज के बारे में पूरा पढ़ा होता तो आप आज उत्तर भारतियों के विषय में इतना ज़हर ना उगलते! ठाकरे जैसे देशद्रोही परिवार को तो ये भी नहीं पता होगा के हमें आज़ादी किस प्रकार मिली! और में इस बात की गारंटी भी देता हूँ के आप को ये भी नहीं पता होगा के किस आधार पर हमें आज़ादी मिली और उसके लिए भारत के कितने वीरों ने कब, कहाँ, कैसे अपने प्राण त्यागे!कितने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम आप जानते हैं? इसी प्रकार इस राज ठाकरे के साथ सिर्फ मोटी बुद्धि या मंदबुद्धी लोग ही हैं!जहां तक बाल ठाकरे की बात है अब उसे क्यों चुनाव में खड़े नहीं होने दिया जाता, किस से वो इतना डरता है के अब पिछले दो चुनाव में वो खडा नहीं हुआ! ये भी शायद आप को नहीं पता होगा! वैसे एक समय उसका प्रभाव, शैली और सोच बहुत अच्छी रही है इसमें कोई शंका नहीं है! मगर समय के साथ-साथ उसे इस बात का घमंड आ गया और आज उसका सिर्फ नाम रह गया है! ये सब आप देख लीजिये के उसके पतन की कहानी शुरू हो गई है! आज हम उसे रावण के तुल्य मान सकते हैं, जिसकी हिम्मत इतनी बाद गई है के उसने राम तुल्य सचिन तेंदुलकर को भी अपनी गन्दी नज़र और से गंदा करने की कोशिश की है! नफरत की आंधी का नया बीब जो राज ठाकरे ने बोया है उसके दिन भी ज्यादा नहीं चलेंगे, या उसे बदलना होगा नहीं तो समय की आंदी उसे भी नहीं छोड़ेगी! वैसे भी एक कहावत है के हर ..... के दिन होते हैं और आज उसका दिन है!
देश की एकता सच्चाई, इमानदारी, प्यार और सद्भावना में है, ये सब एक दिन पता नहीं क्या करा दे भगवान् ही मालिक है!
written by rkrajkamal 815 days ago
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प्रिय मित्र कंचन,
आपने जो लिखा उस से तो यही प्रतीत होता है के आप की अपनी कोई विचारधारा नहीं है! अगर मेरा नाम राज कमल कि जगह कुछ और भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता में सिर्फ कर्म में विशवास रखता हूँ! बोलने कि आदत तो सिर्फ नेताओं कि होती है!अच्छी बात है के मुंबई का नाम बॉम्बे से बदल दिया गया है और ये ही हमारी विरासत कि पहचान है मगर कुछ तो सोचो के सिर्फ नाम से नहीं, किसी कि भी पहचान कर्म से होती है! अगर आप इतिहास को शुरू से आज तक पढ़ें तो आप को ज्ञात होगा के हम भारतियों ने आपसी फूट से क्या-क्या खोया है! सोने कि चिड़िया कहा जाने वाला देश पता नहीं कितनी बार लूटा और बर्बाद किया गया है! १ कोटि कीमत कि कार में घूमने वाले नेता कि बात आप को अच्छी लगती हैं! उस नेता के पक्ष में आप इस का जवाब यहाँ लिख भी रहे हो मगर क्या आपने कभी विदर्भ के किसानो के दर्द के बारे में लिखा है! जहां तक बात राजनीति कि है तो में आप को ये साफ़ बता देता हूँ के में किसी नेता पर भी विशवास नहीं करता, उन लोगों कि ओकात सिर्फ जुबान चलाने कि होती है और मासूम लोग उसमे फंस कर उन को वोट दे देते हैं! रही बात लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आज़मी और मायावती की तो मेरे भाई ये सब परदे के पीछे ठाकरे जैसे ही हैं! जैसे आप आज ठाकरे को अच्छा कह रहे हो उसी प्रकार कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन लोगों को भी अच्छा कहते हैं! वोट बैंक किस प्रकार बनता है ये अभी आप को पता भी नहीं है! एक बार की जीत ५ वर्ष के लिए राजा बना देती है! इस के लिए चाहे आप को कुछ भी कहना पड़े और कुछ भी करना पड़े! आप अभी मधु कोड़ा, नरेन्द्र मोदी , सुखराम और ना जाने कितने हैं जिनका नाम नहीं लिख रहे हैं आप वोही लिख रहे हैं जो आप ने सुना है, क्या आपने कभी किसी किसान के खेत में हल चलाया है, क्या आपने कभी किसी के दुःख में आंसू बहे हैं! आप तो अभी महाराष्ट्र का पूरा इतिहास भी नहीं जानते होंगे फिर देश आप के लिए तो कोई मायने ही नहीं रखता! महान क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज की आधी बात तो सब को याद है मगर, यदि आपने क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज के बारे में पूरा पढ़ा होता तो आप आज उत्तर भारतियों के विषय में इतना ज़हर ना उगलते! ठाकरे जैसे देशद्रोही परिवार को तो ये भी नहीं पता होगा के हमें आज़ादी किस प्रकार मिली! और में इस बात की गारंटी भी देता हूँ के आप को ये भी नहीं पता होगा के किस आधार पर हमें आज़ादी मिली और उसके लिए भारत के कितने वीरों ने कब, कहाँ, कैसे अपने प्राण त्यागे!कितने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम आप जानते हैं? इसी प्रकार इस राज ठाकरे के साथ सिर्फ मोटी बुद्धि या मंदबुद्धी लोग ही हैं!जहां तक बाल ठाकरे की बात है अब उसे क्यों चुनाव में खड़े नहीं होने दिया जाता, किस से वो इतना डरता है के अब पिछले दो चुनाव में वो खडा नहीं हुआ! ये भी शायद आप को नहीं पता होगा! वैसे एक समय उसका प्रभाव, शैली और सोच बहुत अच्छी रही है इसमें कोई शंका नहीं है! मगर समय के साथ-साथ उसे इस बात का घमंड आ गया और आज उसका सिर्फ नाम रह गया है! ये सब आप देख लीजिये के उसके पतन की कहानी शुरू हो गई है! आज हम उसे रावण के तुल्य मान सकते हैं, जिसकी हिम्मत इतनी बाद गई है के उसने राम तुल्य सचिन तेंदुलकर को भी अपनी गन्दी नज़र और से गंदा करने की कोशिश की है! नफरत की आंधी का नया बीब जो राज ठाकरे ने बोया है उसके दिन भी ज्यादा नहीं चलेंगे, या उसे बदलना होगा नहीं तो समय की आंदी उसे भी नहीं छोड़ेगी! वैसे भी एक कहावत है के हर ..... के दिन होते हैं और आज उसका दिन है!
देश की एकता सच्चाई, इमानदारी, प्यार और सद्भावना में है, ये सब एक दिन पता नहीं क्या करा दे भगवान् ही मालिक है!
मला वाटतं, एकतर तुम्ही माझ्या ब्लॉगवर जाऊन तो लेख आणि मी तुम्हाला इथे दिलेली प्रतिक्रिया खरोखरंच पूर्ण वाचलेली नाही किंवा तुम्हाला मराठी नीट समजत नाही. लेखन करताना कुणाची बाजू घेऊन लिहीलं तरच लेखनाला वैचारिक बैठक असते, हा तुम्ही करून घेतलेला गैरसमज आहे. नि:पक्षपातीपाणे कराव्या लागणा-या लेखनासाठी सर्वात जास्त विचार करावा लागतो. या लेखनातून कुणाची बाजू घेतल्यासारखं वाटत असलंच तर आधी मुद्दे नीट वाचावेत. माझ्या लेखनात मी स्पष्टपणे असं म्हटलं आहे, "चुकीच्या व्यक्तीला, चुकीचा प्रश्न विचारला की उत्तरही चुकीचेच मिळणार! ज्या पत्रकारांनी सचिनला, "मुंबई कुणाची?" असा प्रश्न विचारला त्या पत्रकारांनी हे ध्यानात ठेवायला हवे की सचिन म्हणजे निवडणूकीला उभा असलेला राजकीय पक्षाचा नेता नाही. तो जेव्हा खेळतो, तेव्हा संपूर्ण देशासाठी खेळतो. त्याच्या खेळावर फक्त मराठी माणूसच नाही तर इतर भाषिकही खूष असतात. तो जेव्हा बाद होतो, तेव्हा मराठी माणसाइतकंच दु:ख इतर भाषिकांनाही झालेलं असतं. असं असताना, संपूर्णपणे खेळ या क्षेत्राशी निगडीत असलेल्या व्यक्तिमत्त्वाला भाषा व प्रांतवादाविषयी प्रश्न विचारून उत्तर मागण्याचा वेडेपणा करू नये. देशाचा एक सर्वोत्तम खेळाडू म्हणून सचिनचा गौरव केला जातो तेव्हा प्रांतवादावरून व भाषावादावरून प्रश्न विचारून पत्रकार आपली संकुचित वृत्ती दर्शवतात. त्याला प्रांत व भाषेच्या चौकटीत अडकवून सचिनच्या कारकिर्दीला नजर लावू नका." सचिनला मराठी माणूस म्हणून सत्काराला बोलावलं असतं, तर हा प्रश्न उचित होता.
बाळासाहेबांनी सचिनला खडसावल्याचं निमित्त साधून तुम्ही बाळासाहेबांद्दल जे अनुद्गार काढलेत, तेव्हा तुम्हाला देशाच्या इतर भ्रष्ट नेत्यांची नावं आठवली नाहीत म्हणून मी आपला गैरसमज दूर करण्याचा प्रयत्न केला. काही आणखी ’सन्माननीय’ नावांचा उल्लेख अनावधानाने राहून गेला, तो आपण केलातच! नावात काय असतं आणि नावात काय नसतं ह्या प्रश्नाचं उत्तर परिस्थितीनुसार बदलू शकतं. आपण बाळासाहेबांबद्दल जे वक्तव्य केलंत, त्यावर बाळासाहेबांच्या योगदानाबद्दल मी आपल्याला सांगणं म्हणजे त्यांची बाजू घेणं होत नाही. ही सत्यपरिस्थिती आहे कि बाळासाहेब नसते, तर मराठी माणूस मुंबईतून केव्हाच हद्दपार झाला असता.
महाराष्ट्रात आठ वर्षे राहिल्याने आपल्याला महाराष्ट्राची संस्कृती व राज्यभाषा यांची माहीती असायलाच हवी. मात्र, याचा अर्थ असा नाही की आपण महाराष्ट्रात येऊन महाराष्ट्रीय व्यक्तीला महाराष्ट्राची किती माहिती आहे, याबद्दल अंदाज व्यक्त करावा किंवा महाराष्ट्रीय लोकांना महाराष्ट्र अर्धाही माहित नाही असा दावा करावा. केवळ तुम्हाला बरं वाटावं म्हणून कुणी महाराष्ट्राचं क्षेत्रफळ इथे सांगत बसणार नाही.
इतिहासाच्या नोंदी घ्यायच्याच झाल्या तर, देशाच्या अवनतीला जबाबदार कोण? या प्रश्नाचं उत्तर ’देशात इतकी वर्षं कोण सत्तेवर होतं.’ या प्रश्नाच्या उत्तरात सापडेल. कुणाचा गळा चिरला तर कशा वेदना होतात, हे समजून घेण्यासाठी स्वत:चा गळा चिरून घेण्याची काहीच गरज नसते. दुस-याला अमूक गोष्टीबद्दल किती माहित आहे, हे विचारताना आपण किमान आपल्याला दुस-याबद्दल किती माहिती आहे, याचा विचार करा. जर राजकारणी जे बोलतात, ती निव्वळ पोपटपंची आहे, असं वाटत असेल, जर आपला त्यांच्यावर विश्वास नसेल, तर आपण स्वत: राजकारणात का जात नाही? विदर्भातल्या शेतक-यांच्या समस्येबद्दल लिहिलं म्हणजे भारताच्या समस्या सुटतील असं वाटतं का तुम्हाला? की विदर्भाच्या समस्या तुम्हाला माहित झाल्या म्हणजे सगळा महाराष्ट्र कळला असं वाटतं तुम्हाला?
बुंदेलखंडच्या छत्रसाल राजपुत्राला जर शिवाजी महाराजांनी स्वयंभू होण्याची शिकवण दिली नसती तर आज इतिहासात ’"छत्रसाल हा शिवाजी महाराजांचा मांडलिक होता” अशी नोंद असती. काशीहून गागाभट्टांनी येऊन शिवछत्रपतींना राज्याभिषेक केला, उत्तरेच्या कविराज भूषणाने महाराजांवर काव्य रचली, हे माहित असलं म्हणजे शिवछत्रपतींचा इतिहास पूर्ण माहित झाला असं तुम्हाला वाटतं का?
मला काय माहित आहे याची खात्रीशीर माहिती तुम्ही कशाच्या आधारावर काढलीत. स्वातंत्र्य लढ्यात भाग घेतलेल्या विरांची नाव पाठ असली म्हणजे भारताचं स्वातंत्र्य अबाधित रहातं? तुम्ही तर स्वातंत्र्यगाथा तोंडपाठ करूनच फिरत असाल? तुम्हाला मंगल पांडे माहित असणार तर मला आद्य क्रांतिकारक वासुदेव बळवंत फडके माहित आहेत. मित्रा, हा शक्ती तु-याचा सामना नाही. मिळालेलं स्वातंत्र्य टिकवायचं कसं यावर आपण काही वक्तव्य करू शकाल का? नेत्यांना आणि राजकारण्यांना शिव्या दिल्या म्हणजे देशभक्ती होत नाही.
बाळासाहेब ठाकरे आणि राज ठाकरे यांच्याबद्दल तुम्हाला किती माहिती आहे, हे समजलंच. खरंच माहिती असती तुम्हाला तर बाळासाहेबांनी आत्ता निवडणूकीला उभं रहावं असे तारे तुम्ही तोडलेच नसतेत. उत्तर भारतीयांवर कुणीही वैयक्तिक राग ठेवून नाही. मात्र, मराठी माणसाकडून आपल्याला अपेक्षित अशी प्रतिक्रिया मिळाली नाही की उत्तर भारतीयांचं पित्त खवळतं, हे आता सर्व मराठी माणसांना माहित झालं आहे.
राज ठाकरेंनी तिरस्काराचं बीज वगैरे पेरलंय असं मीच काय, कुणीच मराठी माणूस म्हणणार नाही. एकी, सत्य, कृतज्ञता, सद्भावना ह्या शब्दांचा योग्य अर्थ आपल्याला माहित आहे का? मराठी माणसाने इतकी वर्षं महाराष्ट्रात आलेल्या परभाषियांबरोबर त्यांच्या भाषेत बोलून, त्यांच्याशी व्यवहार करून, प्रसंगी त्यांना प्राधान्य देऊन आपण वर उल्लेखिलेल्या सर्व शब्दांचा आदर केला आहे. मात्र उत्तर भारतीयांनी महाराष्ट्रात राहून मुजोरपणे ’मराठी येत नाही, हिंदीत बोला’ असे सांगून एकी, सत्य, कृतज्ञता, सद्भावना यांची मराठी माणसाला नवीच ओळख करून दिली. असे असूनही मराठी साठी महाराष्ट्रातच संघर्ष करणा-या एका नेत्याला अपशब्द वापरणारे, तुम्ही कुणाची पाठ खाजवत आहात, ते स्पष्ट दिसत आहे. राज ठाकरे यांनी बदलावं हीच उत्तरभारतीयांची मागणी आहे, आपणही त्यात सामील असलात तर नवल वाटायला नको.
written by lalya 814 days ago
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I agree with kanchan totally, anybody who read the article patiently would agree. Rajkamal, please understand the view here, at least don't act like news channels.
And if you know enough about bal thacrey then you would know that he comment about situation or people without judging the political correctness, but it also has sense of right over the person. I shouldn't say this, but this is very much a marathi style of poking, and i shouldn't expect you to understand this. Only thing, we hate media taking undue advantage of it, so please don't discuss this further.
written by santoshb 814 days ago
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हा जो कोनि भैया जे काहि लिहितो आहे त्या मुर्खाला आपण काय लिहिले आहे हे कळ्त नसावे....mografulla ने खुप चागले उत्तर दिले आहे. तरि हि त्याच्या मेन्दु नस्लेल्या डोक्यात शिरत नसेल तर त्या भद्व्याला न उत्तर दिलेले च बरे....
आप लोग पुरी तरह भटक चुके हैं और अब शायद ये सब आप के दिमाग में बैठ गई है अगर आप को लगता है के ये सही है तो ठीक है, अपने अधिकारों, संस्कृति, भाषा, मिट्टी, समुदाय, समाज, इतिहास, स्वतन्त्रता, आदि के समर्थन में लड़ना अच्छी बात है! और मैं इस बात मैं आप का पूरी तरह से समर्थन करता हूँ, मगर किसी को मारने का अधिकार किसी को नही है, देश मैं इतनी भी अराजकता नही है के दो टके की औकात के गुँड किसी गरीब और असहाय के ऊपर हिंसात्मक अत्याचार करें! मेरा विरोध आपके विरोध करने के तरीके पर है, आप एक आम आदमी को मार् सकते हैं मगर ये जो प्रणाली/सिस्टम है आप उसके खिलाफ कभी खड़े नही होते! मैंने तब भी विरोध किया था जब महाराष्ट्र की घटनाओ से आहत हो कर हरियाणा में कुछ लोगों ने एक मराठी मनुष्य के खिलाफ दुर्व्यवहार किया था! आप एक आम आदमी को मार् कर अपनी सभ्यता को कलंकित कर रहे हो, और वैसे भी अभद्र भाषा का प्रयोग और हिंसा का प्रयोग तो एक कमजोर और असभ्य आदमी करता है! लड़ना और भोंकना तो जानवर की प्रवर्ती है! आप विरोध करें और में खुद कह्ता हूँकि विरोध करो मगर अपनी सभ्यता और इन्सानियत का हनन कदाचित न करो!
हमारे क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज जी ने भी विरोध किया था मगर अत्याचार का और उन्होने कभी निर्बल और गरीब को नही सताया ! शक्ति का प्रयोग निर्बल और गरीब की सहायता और उसके उत्थान के लिए तथा अत्याचार और बुराई का दमन करने के लिए किया जाता है! इस सब का पालन हमारे क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज जी ने किया इसी लिए वह सम्पूर्ण भारत में श्रद्धा और आदर से पूजे जाते हैं! मगर औरंगज़ेब को तो कोई भी नही मानता! इसी प्रकार ठाकरे परिवार की विध्वंस वाली राजनीति का मैं पुरजोर विरोध करता हूँ और करता रहूंगा! अगर वे इस विध्वंस वाली राजनीति को छोड दें तो शायद उन से अच्छा राजनीतिक दल शायद ही कोई हो ! याद रखो मिल कर चलने में ही सब का भला होता है! महाराष्ट्र के उत्थान के लिए ठाकरे परिवार ने बहुत अच्छे काम किए हैं मगर अब शायद ये सब जो हो रहा है सब दुखद है! अपने सुख के लिए किसी को सताना इन्सानियत नही है! मत बताओ दुसरे ने तुम्हारे लिए क्या किया, सोचो तुम ने क्या किया और जो किया क्या वो सही किया ! मानवता सर्वोपरि है! मानवता से बढ कर कुछ भी नही!
संतोष, लाल्या, ह्या राजकमलला खरंच समजत नाहीये की तो काय लिहितोय. त्याला फक्त मनसे आणि शिवसेनेवर लिहिलेला लेख दिसला, की मनातली जळजळ बाहेर काढायची एवढंच माहिती आहे. तो लेख पूर्ण वाचत नाही. राज ठाकरे, बाळासाहेब ठाकरे इवढी नावं दिसणं हे त्याला प्रतिक्रिया लिहिण्यास पुरेसं आहे. त्याची कृतीच दर्शवते की तो असंस्कृत, असमंजस, अविचारी, असंयमी आणि अतिरेकी आहे. त्याच्यासारखे बरेच जण या महाराष्ट्रात आहेत म्हणून मनसेची आंदोलनं होतात, हे त्याला कळणार नाही.
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भारत बनाम ठाकरे
देशभक्ति या कुर्सी व नाम की भूख
अगर में अपनी बात करूं, तो मैंने अपने जीवन के ८ वर्ष महाराष्ट्र में बिताये हैं ! वहां मैंने मराठी भाषा और संस्कृति को वहां के लोगों के मध्य रह कर जिया और देखा है ! वास्तव में ये एक अनमोल धरोहर है ,और हमारा देश ही मात्र ऐसा देश है जो इस प्रकार की धरोहरों को अपने अंदर संजो कर रखे हुए है! पता नहीं कितने जुल्म हमारे इस देश और और इसकी संस्कृतियों पर हुए, मगर हम पुरातन हैं, हम सनातन हैं, हम कल भी थे ,हम आज भी हैं, और हम ही हैं जो सदैव रहेंगे! विभिन्नता में एकता हमें औरों से अलग करती है!जहाँ अतिथि आज भी देव तुल्य है, जहाँ धरती और नदियों को माता कहा जाता है, जहां आज भी अजनबियों को भैया या बहिन का संबोधन दिया जाता है , ऐसा प्यारा, अनमोल, विचित्र, अनोखा और महँ देश है हमारा! पता नहीं कितने मीरकासिम, जयचंद,और जिन्ना जैसे गद्दारों ने इसे ख़तम करना चाहा मगर जो अजर-अमर है उसे कौन मिटा सकता है!
आज हमारी एकता को ठाकरे नाम का गद्दार फिर ललकार रहा है, वो भी पुराने गद्दारों की तरह सत्ता के लोभ में हमें आपस में लड़ा रहा है, और वो लोग जिनकी अपनी खुद की कोई सोच नहीं है वो उसका साथ दे रहे हैं! लगभग ७५० साल की गुलामी हमने अपनी आपसी फूट के कारण झेली थी! जो हम से अलग हुए(पकिस्तान, बँगला देश, म्यांमार) वो आज तक पनप नहीं पाए हैं !हम आज भी उनसे ज्यादा उन्नत और विकसित हैं!
ठाकरे जैसे लोग पहले तो लोगों के दिलों में ज़हर घोल रहे थे अब उम्र के इस पड़ाव पर सचिन जैसे महान खिलाड़ी के बारे में अभद्र शब्द कह कर अपनी नीच सोच का साक्ष्य दिया है! अगर अपनी संस्कृति और भाषाका इतना ही ख़याल है तो अपने ५ सितारा बंगले और गाड़ियों को छोड़ कर उन गरीब किसानो और लोगों के बीच जा कर सिर्फ १ महिना रह कर दिखाओ, जिन्दगी, गरीबी, संसाधनों की कमी का सही पता तो तब चलेगा! मात्र बकवास करने से कुछ नहीं होगा! मराठी और मराठा की महानता इतनी कच्ची नहीं किउसे कोई भी ख़तम कर देगा!
सचिन के साथ तो पूरा देश ही नहीं वरन पूरा विश्व है मगर कुम्हारे पीछे कौन है इसका पता भी तुम को चुनाव के नतीजों से मिल गया है! अब तुम उस ढोल कि तरह बज रहे हो जो अन्दर से खोखला होता है!
जय हो भारत कि सब्स्कृति, जय हो भारत कि हर भाषा, जय हो भारत का हर निवासी!
वन्देमातरम..........
rkrjkamal,
आपल्या मताशी सहमत नाही. सचिनला खडसावले म्हणजे ठाकरे (जर आपण बाळासाहेब ठाक-यांबद्दलच बोलत असाल तर,) देशद्रोही होत नाहीत. मुंबईचं मुळ नाव विसरून ’बॉम्बे’, ’बंबई’ असे निरनिराळे अपभ्रंश वापरले जात असताना मुंबई नगरीला ’मुंबई’ हे मूळ नाव पुन्हा मिळवून देण्यात ठाकरे यांचंच योगदान आहे. आज मुंबईतील दुकानांवर मराठीत पाट्या दिसताहेत, त्यांचं श्रेयही ठाकरे यांनाच जातं. आपसातल्या शत्रूत्वामुळे १९४७ मधे तिस-याचा फायदा कुणामुळे झाला, हे सर्वजाहिर आहे. ती परंपरा अजूनही सुरुच आहे. ’मुंबई सगळ्यांचीच’ या उत्तरामुळे मुंबईचं बिहार करणा-यांना त्याचा फायदा उचलता येऊ नये, म्हणून ठाक-यांना ते बोलणं आवश्यक होतं असं मला वाटतं. या सर्व प्रकारात ज्या पत्रकाराने असा मुर्ख प्रश्न विचारण्याचा अगोचरपणा केला आहे, त्या पत्रकाराबद्दल कुणालाच काही वाटत नाही. आग रामेश्वरी आणि बंब सोमेश्वरी अशी परिस्थिती तयार झाली आहे. प्रसारमाध्यमांनी प्रश्न विचारताना प्रसंग, परिस्थितीचे भान ठेवायला हवे, याचंही भान कुणाला नाही.
मराठी आणि मराठा इतका कच्चा नाही हे सध्या चाललेल्या आंदोलनांवरून आपल्याला दिसत असेलच. महाराष्ट्रात आपण आठ वर्षे काढलीत, हे खरेच असले पाहिजे, त्याशिवाय का आपण मराठी लेखावर हिंदी भाषेत प्रतिक्रिया देऊ शकलात? मराठीकट्टावर माझ्या लेखाचं संक्षिप्त स्वरूप मांडलं आहे, मात्र माझ्या ब्लॉगवरचा हा पूर्ण लेख आपण वाचला आहे का? मी कुठेही ठाकरे (बाळासाहेब ठाकरे), राज ठाकरे, तसेच सचिन तेंडूलकर यांना चूक म्हटलेले नाही.
ठाकरेंना जर देशद्रोही ठरवायचे असेल, तर लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आझमी यांना काय म्हणणार तुम्ही? त्यांची वक्त्यव्य देशातील जनतेत फूट पाडत नाहीत? दोन मिनिटं असा विचार करा की जर सचिन तेंडूलकरने ’मुंबई मराठी माणसाचीच’ असं उत्तर दिलं असतं, तर देशभरातून कशी प्रतिक्रिया उमटली असती? ढोल आतून पोकळ असतो म्हणूनच त्यातून आवाज येतो. निवडणूकीतील शिवसेनेचा पराभव आणि कॉंग्रेसचा विजय म्हणजे सत्याचा विजय असं तुम्ही म्हणत असाल, तर त्याच शिवसेनेतून बाहेर पडलेला बाळासाहेबांचा अस्सल चेला हळूहळू कशी वाटचाल करतो आहे, हेही तुम्ही पाहिलं असेलच. प्रत्येक व्यक्तीच्या कतृत्वाला वयाची आणि शरीराची बंधनं पाळावीच लागतात. शिवसेनेचा हाच वाघ जर आज थोडा तरूण असता, तर असल्या तरसांना त्याने केव्हाच खाऊन टाकलं असतं.
प्रिय मित्र कंचन,
आपने जो लिखा उस से तो यही प्रतीत होता है के आप की अपनी कोई विचारधारा नहीं है! अगर मेरा नाम राज कमल कि जगह कुछ और भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता में सिर्फ कर्म में विशवास रखता हूँ! बोलने कि आदत तो सिर्फ नेताओं कि होती है!अच्छी बात है के मुंबई का नाम बॉम्बे से बदल दिया गया है और ये ही हमारी विरासत कि पहचान है मगर कुछ तो सोचो के सिर्फ नाम से नहीं, किसी कि भी पहचान कर्म से होती है! अगर आप इतिहास को शुरू से आज तक पढ़ें तो आप को ज्ञात होगा के हम भारतियों ने आपसी फूट से क्या-क्या खोया है! सोने कि चिड़िया कहा जाने वाला देश पता नहीं कितनी बार लूटा और बर्बाद किया गया है! १ कोटि कीमत कि कार में घूमने वाले नेता कि बात आप को अच्छी लगती हैं! उस नेता के पक्ष में आप इस का जवाब यहाँ लिख भी रहे हो मगर क्या आपने कभी विदर्भ के किसानो के दर्द के बारे में लिखा है! जहां तक बात राजनीति कि है तो में आप को ये साफ़ बता देता हूँ के में किसी नेता पर भी विशवास नहीं करता, उन लोगों कि ओकात सिर्फ जुबान चलाने कि होती है और मासूम लोग उसमे फंस कर उन को वोट दे देते हैं! रही बात लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आज़मी और मायावती की तो मेरे भाई ये सब परदे के पीछे ठाकरे जैसे ही हैं! जैसे आप आज ठाकरे को अच्छा कह रहे हो उसी प्रकार कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन लोगों को भी अच्छा कहते हैं! वोट बैंक किस प्रकार बनता है ये अभी आप को पता भी नहीं है! एक बार की जीत ५ वर्ष के लिए राजा बना देती है! इस के लिए चाहे आप को कुछ भी कहना पड़े और कुछ भी करना पड़े! आप अभी मधु कोड़ा, नरेन्द्र मोदी , सुखराम और ना जाने कितने हैं जिनका नाम नहीं लिख रहे हैं आप वोही लिख रहे हैं जो आप ने सुना है, क्या आपने कभी किसी किसान के खेत में हल चलाया है, क्या आपने कभी किसी के दुःख में आंसू बहे हैं! आप तो अभी महाराष्ट्र का पूरा इतिहास भी नहीं जानते होंगे फिर देश आप के लिए तो कोई मायने ही नहीं रखता! महान क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज की आधी बात तो सब को याद है मगर, यदि आपने क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज के बारे में पूरा पढ़ा होता तो आप आज उत्तर भारतियों के विषय में इतना ज़हर ना उगलते! ठाकरे जैसे देशद्रोही परिवार को तो ये भी नहीं पता होगा के हमें आज़ादी किस प्रकार मिली! और में इस बात की गारंटी भी देता हूँ के आप को ये भी नहीं पता होगा के किस आधार पर हमें आज़ादी मिली और उसके लिए भारत के कितने वीरों ने कब, कहाँ, कैसे अपने प्राण त्यागे!कितने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम आप जानते हैं? इसी प्रकार इस राज ठाकरे के साथ सिर्फ मोटी बुद्धि या मंदबुद्धी लोग ही हैं!जहां तक बाल ठाकरे की बात है अब उसे क्यों चुनाव में खड़े नहीं होने दिया जाता, किस से वो इतना डरता है के अब पिछले दो चुनाव में वो खडा नहीं हुआ! ये भी शायद आप को नहीं पता होगा! वैसे एक समय उसका प्रभाव, शैली और सोच बहुत अच्छी रही है इसमें कोई शंका नहीं है! मगर समय के साथ-साथ उसे इस बात का घमंड आ गया और आज उसका सिर्फ नाम रह गया है! ये सब आप देख लीजिये के उसके पतन की कहानी शुरू हो गई है! आज हम उसे रावण के तुल्य मान सकते हैं, जिसकी हिम्मत इतनी बाद गई है के उसने राम तुल्य सचिन तेंदुलकर को भी अपनी गन्दी नज़र और से गंदा करने की कोशिश की है! नफरत की आंधी का नया बीब जो राज ठाकरे ने बोया है उसके दिन भी ज्यादा नहीं चलेंगे, या उसे बदलना होगा नहीं तो समय की आंदी उसे भी नहीं छोड़ेगी! वैसे भी एक कहावत है के हर ..... के दिन होते हैं और आज उसका दिन है!
देश की एकता सच्चाई, इमानदारी, प्यार और सद्भावना में है, ये सब एक दिन पता नहीं क्या करा दे भगवान् ही मालिक है!
प्रिय मित्र कंचन,
आपने जो लिखा उस से तो यही प्रतीत होता है के आप की अपनी कोई विचारधारा नहीं है! अगर मेरा नाम राज कमल कि जगह कुछ और भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता में सिर्फ कर्म में विशवास रखता हूँ! बोलने कि आदत तो सिर्फ नेताओं कि होती है!अच्छी बात है के मुंबई का नाम बॉम्बे से बदल दिया गया है और ये ही हमारी विरासत कि पहचान है मगर कुछ तो सोचो के सिर्फ नाम से नहीं, किसी कि भी पहचान कर्म से होती है! अगर आप इतिहास को शुरू से आज तक पढ़ें तो आप को ज्ञात होगा के हम भारतियों ने आपसी फूट से क्या-क्या खोया है! सोने कि चिड़िया कहा जाने वाला देश पता नहीं कितनी बार लूटा और बर्बाद किया गया है! १ कोटि कीमत कि कार में घूमने वाले नेता कि बात आप को अच्छी लगती हैं! उस नेता के पक्ष में आप इस का जवाब यहाँ लिख भी रहे हो मगर क्या आपने कभी विदर्भ के किसानो के दर्द के बारे में लिखा है! जहां तक बात राजनीति कि है तो में आप को ये साफ़ बता देता हूँ के में किसी नेता पर भी विशवास नहीं करता, उन लोगों कि ओकात सिर्फ जुबान चलाने कि होती है और मासूम लोग उसमे फंस कर उन को वोट दे देते हैं! रही बात लालूप्रसाद यादव, मुलायमसिंह, अमरसिंह, अबू आज़मी और मायावती की तो मेरे भाई ये सब परदे के पीछे ठाकरे जैसे ही हैं! जैसे आप आज ठाकरे को अच्छा कह रहे हो उसी प्रकार कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन लोगों को भी अच्छा कहते हैं! वोट बैंक किस प्रकार बनता है ये अभी आप को पता भी नहीं है! एक बार की जीत ५ वर्ष के लिए राजा बना देती है! इस के लिए चाहे आप को कुछ भी कहना पड़े और कुछ भी करना पड़े! आप अभी मधु कोड़ा, नरेन्द्र मोदी , सुखराम और ना जाने कितने हैं जिनका नाम नहीं लिख रहे हैं आप वोही लिख रहे हैं जो आप ने सुना है, क्या आपने कभी किसी किसान के खेत में हल चलाया है, क्या आपने कभी किसी के दुःख में आंसू बहे हैं! आप तो अभी महाराष्ट्र का पूरा इतिहास भी नहीं जानते होंगे फिर देश आप के लिए तो कोई मायने ही नहीं रखता! महान क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज की आधी बात तो सब को याद है मगर, यदि आपने क्षत्रपति श्री शिवाजी महाराज के बारे में पूरा पढ़ा होता तो आप आज उत्तर भारतियों के विषय में इतना ज़हर ना उगलते! ठाकरे जैसे देशद्रोही परिवार को तो ये भी नहीं पता होगा के हमें आज़ादी किस प्रकार मिली! और में इस बात की गारंटी भी देता हूँ के आप को ये भी नहीं पता होगा के किस आधार पर हमें आज़ादी मिली और उसके लिए भारत के कितने वीरों ने कब, कहाँ, कैसे अपने प्राण त्यागे!कितने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम आप जानते हैं? इसी प्रकार इस राज ठाकरे के साथ सिर्फ मोटी बुद्धि या मंदबुद्धी लोग ही हैं!जहां तक बाल ठाकरे की बात है अब उसे क्यों चुनाव में खड़े नहीं होने दिया जाता, किस से वो इतना डरता है के अब पिछले दो चुनाव में वो खडा नहीं हुआ! ये भी शायद आप को नहीं पता होगा! वैसे एक समय उसका प्रभाव, शैली और सोच बहुत अच्छी रही है इसमें कोई शंका नहीं है! मगर समय के साथ-साथ उसे इस बात का घमंड आ गया और आज उसका सिर्फ नाम रह गया है! ये सब आप देख लीजिये के उसके पतन की कहानी शुरू हो गई है! आज हम उसे रावण के तुल्य मान सकते हैं, जिसकी हिम्मत इतनी बाद गई है के उसने राम तुल्य सचिन तेंदुलकर को भी अपनी गन्दी नज़र और से गंदा करने की कोशिश की है! नफरत की आंधी का नया बीब जो राज ठाकरे ने बोया है उसके दिन भी ज्यादा नहीं चलेंगे, या उसे बदलना होगा नहीं तो समय की आंदी उसे भी नहीं छोड़ेगी! वैसे भी एक कहावत है के हर ..... के दिन होते हैं और आज उसका दिन है!
देश की एकता सच्चाई, इमानदारी, प्यार और सद्भावना में है, ये सब एक दिन पता नहीं क्या करा दे भगवान् ही मालिक है!
मला वाटतं, एकतर तुम्ही माझ्या ब्लॉगवर जाऊन तो लेख आणि मी तुम्हाला इथे दिलेली प्रतिक्रिया खरोखरंच पूर्ण वाचलेली नाही किंवा तुम्हाला मराठी नीट समजत नाही. लेखन करताना कुणाची बाजू घेऊन लिहीलं तरच लेखनाला वैचारिक बैठक असते, हा तुम्ही करून घेतलेला गैरसमज आहे. नि:पक्षपातीपाणे कराव्या लागणा-या लेखनासाठी सर्वात जास्त विचार करावा लागतो. या लेखनातून कुणाची बाजू घेतल्यासारखं वाटत असलंच तर आधी मुद्दे नीट वाचावेत. माझ्या लेखनात मी स्पष्टपणे असं म्हटलं आहे, "चुकीच्या व्यक्तीला, चुकीचा प्रश्न विचारला की उत्तरही चुकीचेच मिळणार! ज्या पत्रकारांनी सचिनला, "मुंबई कुणाची?" असा प्रश्न विचारला त्या पत्रकारांनी हे ध्यानात ठेवायला हवे की सचिन म्हणजे निवडणूकीला उभा असलेला राजकीय पक्षाचा नेता नाही. तो जेव्हा खेळतो, तेव्हा संपूर्ण देशासाठी खेळतो. त्याच्या खेळावर फक्त मराठी माणूसच नाही तर इतर भाषिकही खूष असतात. तो जेव्हा बाद होतो, तेव्हा मराठी माणसाइतकंच दु:ख इतर भाषिकांनाही झालेलं असतं. असं असताना, संपूर्णपणे खेळ या क्षेत्राशी निगडीत असलेल्या व्यक्तिमत्त्वाला भाषा व प्रांतवादाविषयी प्रश्न विचारून उत्तर मागण्याचा वेडेपणा करू नये. देशाचा एक सर्वोत्तम खेळाडू म्हणून सचिनचा गौरव केला जातो तेव्हा प्रांतवादावरून व भाषावादावरून प्रश्न विचारून पत्रकार आपली संकुचित वृत्ती दर्शवतात. त्याला प्रांत व भाषेच्या चौकटीत अडकवून सचिनच्या कारकिर्दीला नजर लावू नका." सचिनला मराठी माणूस म्हणून सत्काराला बोलावलं असतं, तर हा प्रश्न उचित होता.
बाळासाहेबांनी सचिनला खडसावल्याचं निमित्त साधून तुम्ही बाळासाहेबांद्दल जे अनुद्गार काढलेत, तेव्हा तुम्हाला देशाच्या इतर भ्रष्ट नेत्यांची नावं आठवली नाहीत म्हणून मी आपला गैरसमज दूर करण्याचा प्रयत्न केला. काही आणखी ’सन्माननीय’ नावांचा उल्लेख अनावधानाने राहून गेला, तो आपण केलातच! नावात काय असतं आणि नावात काय नसतं ह्या प्रश्नाचं उत्तर परिस्थितीनुसार बदलू शकतं. आपण बाळासाहेबांबद्दल जे वक्तव्य केलंत, त्यावर बाळासाहेबांच्या योगदानाबद्दल मी आपल्याला सांगणं म्हणजे त्यांची बाजू घेणं होत नाही. ही सत्यपरिस्थिती आहे कि बाळासाहेब नसते, तर मराठी माणूस मुंबईतून केव्हाच हद्दपार झाला असता.
महाराष्ट्रात आठ वर्षे राहिल्याने आपल्याला महाराष्ट्राची संस्कृती व राज्यभाषा यांची माहीती असायलाच हवी. मात्र, याचा अर्थ असा नाही की आपण महाराष्ट्रात येऊन महाराष्ट्रीय व्यक्तीला महाराष्ट्राची किती माहिती आहे, याबद्दल अंदाज व्यक्त करावा किंवा महाराष्ट्रीय लोकांना महाराष्ट्र अर्धाही माहित नाही असा दावा करावा. केवळ तुम्हाला बरं वाटावं म्हणून कुणी महाराष्ट्राचं क्षेत्रफळ इथे सांगत बसणार नाही.
इतिहासाच्या नोंदी घ्यायच्याच झाल्या तर, देशाच्या अवनतीला जबाबदार कोण? या प्रश्नाचं उत्तर ’देशात इतकी वर्षं कोण सत्तेवर होतं.’ या प्रश्नाच्या उत्तरात सापडेल. कुणाचा गळा चिरला तर कशा वेदना होतात, हे समजून घेण्यासाठी स्वत:चा गळा चिरून घेण्याची काहीच गरज नसते. दुस-याला अमूक गोष्टीबद्दल किती माहित आहे, हे विचारताना आपण किमान आपल्याला दुस-याबद्दल किती माहिती आहे, याचा विचार करा. जर राजकारणी जे बोलतात, ती निव्वळ पोपटपंची आहे, असं वाटत असेल, जर आपला त्यांच्यावर विश्वास नसेल, तर आपण स्वत: राजकारणात का जात नाही? विदर्भातल्या शेतक-यांच्या समस्येबद्दल लिहिलं म्हणजे भारताच्या समस्या सुटतील असं वाटतं का तुम्हाला? की विदर्भाच्या समस्या तुम्हाला माहित झाल्या म्हणजे सगळा महाराष्ट्र कळला असं वाटतं तुम्हाला?
बुंदेलखंडच्या छत्रसाल राजपुत्राला जर शिवाजी महाराजांनी स्वयंभू होण्याची शिकवण दिली नसती तर आज इतिहासात ’"छत्रसाल हा शिवाजी महाराजांचा मांडलिक होता” अशी नोंद असती. काशीहून गागाभट्टांनी येऊन शिवछत्रपतींना राज्याभिषेक केला, उत्तरेच्या कविराज भूषणाने महाराजांवर काव्य रचली, हे माहित असलं म्हणजे शिवछत्रपतींचा इतिहास पूर्ण माहित झाला असं तुम्हाला वाटतं का?
मला काय माहित आहे याची खात्रीशीर माहिती तुम्ही कशाच्या आधारावर काढलीत. स्वातंत्र्य लढ्यात भाग घेतलेल्या विरांची नाव पाठ असली म्हणजे भारताचं स्वातंत्र्य अबाधित रहातं? तुम्ही तर स्वातंत्र्यगाथा तोंडपाठ करूनच फिरत असाल? तुम्हाला मंगल पांडे माहित असणार तर मला आद्य क्रांतिकारक वासुदेव बळवंत फडके माहित आहेत. मित्रा, हा शक्ती तु-याचा सामना नाही. मिळालेलं स्वातंत्र्य टिकवायचं कसं यावर आपण काही वक्तव्य करू शकाल का? नेत्यांना आणि राजकारण्यांना शिव्या दिल्या म्हणजे देशभक्ती होत नाही.
बाळासाहेब ठाकरे आणि राज ठाकरे यांच्याबद्दल तुम्हाला किती माहिती आहे, हे समजलंच. खरंच माहिती असती तुम्हाला तर बाळासाहेबांनी आत्ता निवडणूकीला उभं रहावं असे तारे तुम्ही तोडलेच नसतेत. उत्तर भारतीयांवर कुणीही वैयक्तिक राग ठेवून नाही. मात्र, मराठी माणसाकडून आपल्याला अपेक्षित अशी प्रतिक्रिया मिळाली नाही की उत्तर भारतीयांचं पित्त खवळतं, हे आता सर्व मराठी माणसांना माहित झालं आहे.
राज ठाकरेंनी तिरस्काराचं बीज वगैरे पेरलंय असं मीच काय, कुणीच मराठी माणूस म्हणणार नाही. एकी, सत्य, कृतज्ञता, सद्भावना ह्या शब्दांचा योग्य अर्थ आपल्याला माहित आहे का? मराठी माणसाने इतकी वर्षं महाराष्ट्रात आलेल्या परभाषियांबरोबर त्यांच्या भाषेत बोलून, त्यांच्याशी व्यवहार करून, प्रसंगी त्यांना प्राधान्य देऊन आपण वर उल्लेखिलेल्या सर्व शब्दांचा आदर केला आहे. मात्र उत्तर भारतीयांनी महाराष्ट्रात राहून मुजोरपणे ’मराठी येत नाही, हिंदीत बोला’ असे सांगून एकी, सत्य, कृतज्ञता, सद्भावना यांची मराठी माणसाला नवीच ओळख करून दिली. असे असूनही मराठी साठी महाराष्ट्रातच संघर्ष करणा-या एका नेत्याला अपशब्द वापरणारे, तुम्ही कुणाची पाठ खाजवत आहात, ते स्पष्ट दिसत आहे. राज ठाकरे यांनी बदलावं हीच उत्तरभारतीयांची मागणी आहे, आपणही त्यात सामील असलात तर नवल वाटायला नको.
I agree with kanchan totally, anybody who read the article patiently would agree. Rajkamal, please understand the view here, at least don't act like news channels.
And if you know enough about bal thacrey then you would know that he comment about situation or people without judging the political correctness, but it also has sense of right over the person. I shouldn't say this, but this is very much a marathi style of poking, and i shouldn't expect you to understand this. Only thing, we hate media taking undue advantage of it, so please don't discuss this further.
हा जो कोनि भैया जे काहि लिहितो आहे त्या मुर्खाला आपण काय लिहिले आहे हे कळ्त नसावे....mografulla ने खुप चागले उत्तर दिले आहे. तरि हि त्याच्या मेन्दु नस्लेल्या डोक्यात शिरत नसेल तर त्या भद्व्याला न उत्तर दिलेले च बरे....
संतोष, लाल्या, ह्या राजकमलला खरंच समजत नाहीये की तो काय लिहितोय. त्याला फक्त मनसे आणि शिवसेनेवर लिहिलेला लेख दिसला, की मनातली जळजळ बाहेर काढायची एवढंच माहिती आहे. तो लेख पूर्ण वाचत नाही. राज ठाकरे, बाळासाहेब ठाकरे इवढी नावं दिसणं हे त्याला प्रतिक्रिया लिहिण्यास पुरेसं आहे. त्याची कृतीच दर्शवते की तो असंस्कृत, असमंजस, अविचारी, असंयमी आणि अतिरेकी आहे. त्याच्यासारखे बरेच जण या महाराष्ट्रात आहेत म्हणून मनसेची आंदोलनं होतात, हे त्याला कळणार नाही.